अमित श्रीवास्तव
हिन्द न्यूज़ टाइम्स
बस्ती

जांबवान   और  हनुमान जी का प्रेरक. प्रसंग =======================पवन तनय बल पवन समाना। बुधि बिबेक बिग्यान निधाना॥
कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं॥

ऋक्षराज जाम्बवान्‌ ने श्री हनुमानजी से कहा- हे हनुमान्‌! हे बलवान्‌! सुनो, तुम पवन के पुत्र हो और बल में पवन के समान हो। तुम बुद्धि-विवेक और विज्ञान की खान हो॥ जगत्‌ में कौन सा ऐसा कठिन काम है जो हे तात! तुमसे न हो सके।

अभिप्राय यह है की वायु इस संसार को चलाने और मिटाने मे समर्थ है तथा पञ्च महाभूत जिनसे मिलकर इस मानव शरीर का निर्माण हुआ है उसके सांस के लिए प्राणवायु है । वानरराज सुग्रीव ने किष्किन्धा से रवाना होते समय कहा था की एक मास में माँ सीता की सुधि लेकर आनी है अन्यथा जीवन खत्म । इन वानरों के जीवन को बचाओ ।

हे पवन पुत्र आप बुद्धि, विवेक और विज्ञानं के अपार भण्डार हो । बुद्धि का अर्थ यहाँ बोद्धिक चेतना से है । आप जानते हो की जिस जगह आप जा रहे हो वह आप से सदा सर्वथा अनभिज्ञ है किन्तु आप स्वविवेक से उन आने वाली दुस्तर परिस्थितियों को भी अपने कार्य करने के विशिस्ट ज्ञान विज्ञान द्वारा संभव करना जानते हो । अब यहां तक जो जामवंत जी ने कहा वो उनको सावधान करने का तथा उनसे यह विनय का था की आर्तजनो के प्राण बचाओ । लेकिन अगली पंक्ति में उन्होंने श्री हनुमान जी को उनके भूले हुए बल की बहुत अद्भुत तरीके से याद दिला दी ।

कवन सो काज कठिन जग माहि, जो नहीं होत तात तुम पाहि ।

जामवंत जी कहते है की इस जगत में ऐसा कौनसा कार्य है जो की आप ने किया नहीं और नहीं कर सकते । बहुत बड़ी बात एक छोटी सी लाइन में पवनपुत्र के विस्मर्त बल को जगाने हेतु । भावार्थ देखिये की जिसने पैदा होते ही सूर्य को लील्यो ताहि मधुर फल जानू  वह सूर्य तक बालपन मे पहुँचने वाला वीर बजरग आज चुप है । आप तो भय से सदा सर्वाथ दूर हो और श्री हनुमान जी एकादश रूद्र के अवतार है और भगवान् राम के अनन्य भक्त यह बात जामवंत जी भलीभांति जानते थे सो उन्होंने यह बात कही ।

पवन तनय बल पवन समाना। बुधि बिबेक बिग्यान निधाना॥
कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं॥
राम काज लगि तव अवतारा। सुनतहिं भयउ पर्बताकारा॥

ऋक्षराज जाम्बवान्‌ ने श्री हनुमानजी से कहा- हे हनुमान्‌! हे बलवान्‌! सुनो, तुम पवन के पुत्र हो और बल में पवन के समान हो। तुम बुद्धि-विवेक और विज्ञान की खान हो॥ जगत्‌ में कौन सा ऐसा कठिन काम है जो हे तात! तुमसे न हो सके। श्री रामजी के कार्य के लिए ही तो तुम्हारा अवतार हुआ है। यह सुनते ही हनुमान्‌जी पर्वत के आकार के (अत्यंत विशालकाय) हो गए॥

* कनक बरन तन तेज बिराजा। मानहुँ अपर गिरिन्ह कर राजा॥
सिंहनाद करि बारहिं बारा। लीलहिं नाघउँ जलनिधि खारा॥

भावार्थ:-उनका सोने का सा रंग है, शरीर पर तेज सुशोभित है, मानो दूसरा पर्वतों का राजा सुमेरु हो। हनुमान्‌जी ने बार-बार सिंहनाद करके कहा- मैं इस खारे समुद्र को खेल में ही लाँघ सकता हूँ॥

* सहित सहाय रावनहि मारी। आनउँ इहाँ त्रिकूट उपारी॥
जामवंत मैं पूँछउँ तोही। उचित सिखावनु दीजहु मोही॥

भावार्थ:- और सहायकों सहित रावण को मारकर त्रिकूट पर्वत को उखाड़कर यहाँ ला सकता हूँ। हे जाम्बवान्‌! मैं तुमसे पूछता हूँ, तुम मुझे उचित सीख देना (कि मुझे क्या करना चाहिए)॥

* एतना करहु तात तुम्ह जाई। सीतहि देखि कहहु सुधि आई॥
तब निज भुज बल राजिवनैना। कौतुक लागि संग कपि सेना॥

भावार्थ:-(जाम्बवान्‌ ने कहा-) हे तात! तुम जाकर इतना ही करो कि सीताजी को देखकर लौट आओ और उनकी खबर कह दो। फिर कमलनयन श्री रामजी अपने बाहुबल से (ही राक्षसों का संहार कर सीताजी को ले आएँगे, केवल) खेल के लिए ही वे वानरों की सेना साथ लेंगे॥

* कपि सेन संग सँघारि निसिचर रामु सीतहि आनि हैं।
त्रैलोक पावन सुजसु सुर मुनि नारदादि बखानि हैं॥
जो सुनत गावत कहत समुक्षत परमपद नर पावई।
रघुबीर पद पाथोज मधुकर दास तुलसी गावई॥

भावार्थ:-वानरों की सेना साथ लेकर राक्षसों का संहार करके श्री रामजी सीताजी को ले आएँगे। तब देवता और नारदादि मुनि भगवान्‌ के तीनों लोकों को पवित्र करने वाले सुंदर यश का बखान करेंगे, जिसे सुनने, गाने, कहने और समझने से मनुष्य परमपद पाते हैं और जिसे श्री रघुवीर के चरणकमल का मधुकर (भ्रमर) तुलसीदास गाता है।

* भव भेषज रघुनाथ जसु सुनहिं जे नर अरु नारि।
तिन्ह कर सकल मनोरथ सिद्ध करहिं त्रिसिरारि॥

भावार्थ:-श्री रघुवीर का यश भव (जन्म-मरण) रूपी रोग की (अचूक) दवा है। जो पुरुष और स्त्री इसे सुनेंगे, त्रिशिरा के शत्रु श्री रामजी उनके सब मनोरथों को सिद्ध करेंगे॥

* नीलोत्पल तन स्याम काम कोटि सोभा अधिक।
सुनिअ तासु गुन ग्राम जासु नाम अघ खग बधिक॥

भावार्थ:-जिनका नीले कमल के समान श्याम शरीर है, जिनकी शोभा करोड़ों कामदेवों से भी अधिक है और जिनका नाम पापरूपी पक्षियों को मारने के लिए बधिक (व्याधा) के समान है, उन श्री राम के गुणों के समूह (लीला) को अवश्य सुनना चाहिए॥

लंका को उखाड़कर, रावण को मारकर माता सीता को ले औन । जामवंत जी ने कहा नहीं तात आप सिर्फ पता लगाओ की माता सीता है कहाँ तो श्री हनुमान जी प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहि जलधि लांघ गए अचरज नाही ।

तो बस अर्पण कीजिये इस आस्था के साथ की बेगी हरो हनुमान महाप्रभु जो कछु संकट होय हमारो । विश्वास रखिये श्री लक्ष्मण जी के लिए द्रोण गिरी पर्वत लाने वाले के लिए हमारे कष्टों का अंत करना दुरुह नहीं है ।
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