लॉकडाउन में सिपाही ने रोकी डीएम की कार
बुलंदशहर जिलाधिकारी ने सिपाही को दी शाबाशी
सिपाही अरुण की मिसाल देते नहीं थक रही यूपी पुलिस
बुलंदशहर: कोरोना लॉकडाउन के दौरान बेवजह घूमने वालों पर रोक लगाने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी पुलिसकर्मियों पर है। जोर जबरदस्ती करने पर कई बार पुलिस वालों को आम लोगों की आलोचना का भी शिकार होना पड़ता है। वहीं कर्तव्यनिष्ठा के कारण कई बार उन्हें शाबाशी भी मिलती है। ऐसा ही कुछ हुआ उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में।
बुलंदशहर में कार में ड्राईवर सहित तीन लोगों को घूमते देख कांस्टेबल ने उन्हें धर दबोचा।
इसके बाद सबसे पहले कथित घुमक्कड़ों को कोरोना वायरस के खतरे के बारे में समझाया। साथ ही सवाधानियों की बाबत हिदायत दी। समझा बुझाकर कॉन्स्टेबल ने कार सवारों को छोड़ दिया।
इस दौरान कांस्टेबल को इस बात का गुमां तक नहीं हुआ कि कार में खुद जिले के जिलाधिकारी बैठे हुए हैं। डीएम रविन्द्र कुमार ने भी सिपाही के सामने जाहिर नहीं होने दिया कि वे डिस्ट्रिक्ट के आला अधिकारी है। हालांकि रविंद्र कुमार कॉन्स्टेबल की ड्यूटी परायणता से खासे प्रभावित हुए।
दफ्तर पहुंचकर जिलाधिकारी रविंद्र कुमार ने सबसे पहेल कॉन्स्टेबल के नाम एक प्रशस्ति पत्र जारी किया। इसके बाद वाकये के बारे में जिले के एएसपी को बताई। जिले के पुलिस कप्तान भी काफी खुश हुए और उन्होंने तत्काल सिपाही को 2000 रुपए ईनाम दिया।
कांस्टेबल अरुण कुमार को जब बताया गया कि लॉकडाउन में निरीक्षण के लिए निकले जिलाधिकारी को उन्होंने रोक लिया था। तो पहले तो सिपाही अरुण को लगा कि उनसे बड़ी चूक हो गई है। जब प्रशंसा पत्र दिया गया तो उन्हें दिलासा मिली। वास्तव में सिपाही अरुण कुमार ने काबिले तारीफ काम किया था। महंगी और चमचमाती कारों में सवार लोगों को देख अक्सर पुलिसकर्मी प्रभावित होते हैं। जबकि अरुण के तेवर में ऐसा कुछ भी नहीं दिखा।
सिपाही अरुण से बाकी शहरों के पुलिसकर्मी भी कर्तव्यपरायणता की सीख ले सकते हैं। नियमों के परे कोई हाकिम नहीं हो सकता है। ये जरूर है कि जिलाधिकारी को निरीक्षण करने की छूट है। बावजूद पहचाने न जाने की स्थिति में कोई सिपाही उन्हें समझाये तो इसमें कुछ गलत नहीं है।
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