योग प्राचीन भारतीय संस्कृति की महान विद्या है। यह जीवन जीने की अद्भुत कला है। मानव जीवन का सार है.यह एक महान जीवन दर्शन है जीवन पद्धति है। योग जीवन जीने की स्वस्थ शैली है। मानव के आंतरिक व आत्मिक विकास से जुड़ा यह योग विज्ञान भावी पीढ़ियों के लिए एक महान वरदान है।
योग मात्र एक व्यायाम नहीं अपितु एक सांस्कृतिक आयाम है।

जीवन को रुपांतरित करने की कला है।
योग के शाब्दिक अर्थ पर विचार करें तो यह संस्कृत भाषा की युज धातु से बना है जिसका अर्थ है जोड़ना। योग आत्मा से परमात्मा को जोड़ता है। यह शरीर से मन का सामंजस्य बना कर स्वस्थ जीवन शैली को प्रोत्साहित करता है।
योग भारतीय संस्कृति की अत्यंत प्राचीन व वैज्ञानिक विधा है। महृषि पतंजलि के अनुसार, योगश्चित वृत्ति निरोध: अर्थात योग मन की वृतियों पर नियंत्रण रखने की प्रक्रिया है, मन के दोषों को नियंत्रित करने की कला है। भगवान श्री कृष्ण गीता में कहते हैं, योग: कर्मसु कौशलम् अर्थात कार्य में कुशलता ही योग है।
योग के मुख्य अंगों में यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान व समाधि हैं जिन्हें अष्टांग योग के नाम से जाना जाता है। आसनों के नियमित अभ्यास से शरीर में लचीलापन व दृढ़ता उत्पन्न होती है। शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकास होता है. शरीर की समस्त प्रणालियों में सामंजस्य स्थापित होता है जो कि स्वस्थ जीवन का मूल आधार है।
आसनों के साथ ही प्राणायाम का सतत अभ्यास सांसो की लय को नियंत्रित करने का अद्भुत विज्ञान है। श्वास प्रश्वास की प्रक्रिया उचित न होने पर शरीर में कई प्रकार की व्याधियाँ व दोष उत्पन्न हो जाते हैं। एक शोध के अनुसार हम अपनी श्वास क्षमता का मात्र दस प्रतिशत ही उपयोग करते हैं तथा हमारे मस्तिष्क का दस प्रतिशत ही सक्रिय है। प्राणायाम के अभ्यास से गहरी श्वास क्षमता का विकास होता है.जो जीवनी शक्ति के विकास व रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में अत्यंत महत्वपूर्ण है।

आसनों में हलासन,सर्वांगासन, धनुरासन.भुजंगासन, शलभासन, पश्चिमोतानासन, त्रिकोण आसन इत्यादि से शरीर की मांसपेशियों का प्रसार एवं संकोच होता है जिस से मांसपेशियों का लचीला पन स्थिर रहता है सूर्य नमस्कार आसन से संपूर्ण शरीर का व्यायाम होता है व शरीर की कार्यकुशलता, बल, ओज और तेज बढ़ता है। शरीर में रक्त संचार का कार्य सुचारू रुप से होता है।
प्राणायाम में भस्त्रिका, कपाल भाति, अनुलोम विलोम , भ्रामरी अत्यंत उपयोगी हैं इनके नियमित अभ्यास से शारीरिक व्याधियाँ व मानसिक रोग नष्ट होते हैं. प्राणायाम से सम्पूर्ण स्नायु मण्डल का समुचित व्यायाम हो जाता है।
अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस से विश्व भर में इस प्राचीन व महान भारतीय संस्कृति की गरिमा व प्रतिष्ठा बढ़ी है। योग से मानव मात्र को जोड़ने की यह हमारे देश की अनोखी पहल है . योग किसी भी मत, संप्रदाय, धर्म से परे है.यह प्राणी मात्र के लिए है. इस ने पूरे विश्व को एक परिवार की भांति बांध दिया है।
आधुनिक समय में योग की विश्वसनीयता व व्यावहारिकता बहुत अधिक बढ़ गई है। बदलती हुई सामाजिक व प्राकृतिक परिस्थितियों के कारण मानव जीवन में अनेक शारीरिक व मानसिक व्याधियाँ उत्पन्न हो रही हैं जो नियन्त्रण से परे हैं मानसिक तनाव व चिंता से युवा पीढ़ी ग्रस्त है जो कि स्वस्थ व सफल जीवन में बाधा उत्पन्न करते हैं मानव जीवन अनमोल वरदान है। यह समस्त सिद्धियों का आधार है। स्वस्थ मनुष्य ही जीवन के लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है व खुशहाल जीवन जी सकता है। अपने शरीर को रोगमुक्त बनाना प्रत्येक मानव का धर्म है।
आओ योग दिवस के महान अवसर पर योग को जीवन का अभिन्न अंग बनाने का संकल्प लें.इस को व्यावहारिक रूप से अपनाने का प्रण लें। स्वंय जुड़े व सब को योग की ओर प्रेरित करें।
योग जीवन जीने की कला है। आओ इस कला को अपनाएँ व इस के संरक्षण व संवर्धन में अपना उतरदायित्व सुनिश्चित करें.और शारीरिक व मानसिक रूप से स्वस्थ व समर्थ व खुशहाल समाज के निर्माण में सहयोगी बनें।
 स्वतंत्र लेखक,विक्रम वर्मा, चम्बा।
Share To:

Post A Comment: