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Collect by Amit Srivastava
Hind News Times
Basti U.P.
पत्रकारिता (अंग्रेजी : Journalism) आधुनिक सभ्यता का एक प्रमुख व्यवसाय है जिसमें समाचारों का एकत्रीकरण, लिखना, जानकारी एकत्रित करके पहुँचाना, सम्पादित करना और सम्यक प्रस्तुतीकरण आदि सम्मिलित हैं। आज के युग में पत्रकारिता के भी अनेक माध्यम हो गये हैं; जैसे - अखबार, पत्रिकायें, रेडियो, दूरदर्शन, वेब-पत्रकारिता आदि। बदलते वक्त के साथ बाजारवाद और पत्रकारिता के अंतर्संबंधों ने पत्रकारिता की विषय-वस्तु तथा प्रस्तुति शैली में व्यापक परिवर्तन किए।
परिभाषा संपादित करें
पत्रकारिता शब्द अंग्रेज़ी के "जर्नलिज़्म" (Journalism) का हिंदी रूपांतर है। शब्दार्थ की दृष्टि से "जर्नलिज्म" शब्द 'जर्नल' से निर्मित है और इसका आशय है 'दैनिक'। अर्थात जिसमें दैनिक कार्यों व सरकारी बैठकों का विवरण हो। आज जर्णल शब्द 'मैगजीन' का द्योतक हो चला है। यानी, दैनिक, दैनिक समाचार-पत्र या दूसरे प्रकाशन, कोई सर्वाधिक प्रकाशन जिसमें किसी विशिष्ट क्षेत्र के समाचार हो। ( डॉ॰ हरिमोहन एवं हरिशंकर जोशी- खोजी पत्रकारिता, तक्षशिला प्रकाशन )
पत्रकारिता लोकतंत्र का अविभाज्य अंग है। प्रतिपल परिवर्तित होनेवाले जीवन और जगत का दर्शन पत्रकारिता द्वारा ही संभंव है। परिस्थितियों के अध्ययन, चिंतन-मनन और आत्माभिव्यक्ति की प्रवृत्ति और दूसरों का कल्याण अर्थात् लोकमंगल की भावना ने ही पत्रकारिता को जन्म दिया। जर्नलिज्म में मोजो
ना 15-20 किलो का ट्राईपॉड, कैमरा और नाही 3-जी मशीन या ओबी वैन ... बस एक मोबाइल और हल्का किलो भर का ट्राइपॉड ... जहां मन वहां ताना लाइव शुरू ... एक समय था जब टीवी पत्रकारिता मतलब बड़ा तामझाम था लेकिन अब तो एक ही शख्स मोबाइल कैमरे से शूट भी करता है रिपोर्टिंग भी और लाइव टेलीकॉस्ट भी वो भी मोबाइल फ़ोन से ही। तकनीकी विकास ने टी वी पत्रकारिता का सिर्फ कायापलट नही किया है नाम भी बदल दिया है । इस नये युग की पत्रकारिता को अब मोजो के नाम से जाना जाता है । मोजो माने मोबाइल जर्नलिज्म। लागत भी टीवी किट के मुकाबले बेहद कम है। इसका सबसे बड़ा फायदा ब्रेकिंग न्यूज की परिस्थितियों में है। जहां पर सीधे प्रसारण के लिए कैमरे और ओबी वैन ले जाने में दिक्कत होती है वहां मोजो किट आसानी से सबसे पहली तस्वीरें दर्शकों के पास पहुंचा सकती हैं। 70 का दशक था जब टी वी पत्रकारिता की शुरुआत हुई। उस समय पत्रकार , कैमरामैन ,साउंड रिकॉर्डर और सहायक मतलब चार लोगों की टीम हुआ करती थी । यू - मैटिक कैमरा हुआ करता था बिना रिकॉर्डर के यानी रिकॉर्डर अलग से रहता था । टेप भी बड़ा एक किताब के आकार का हुआ करता था लेकिन उसमे रिकोर्डिंग 10 और 20 मिनट ही कर सकते थे। बाजार में तब सोनी कंपनी का बोलबाला था । सोनी कंपनी ने ही बाद में बीटा मैक्स फॉर्मेट लाया जो उस दौर में एडवांस माना जाता था । बीटा मैक्स टेप का आकार यू मैटिक से थोड़ा छोटा था जबकि रिकॉर्डिंग के लिए ज्यादा जगहं थी। ये फॉर्मेट कई वर्षों तक चला। लेकिन बीटा कैमकॉर्डर ने आते ही बीटा मैक्स की जगहं ले ली क्योंकि इसमें रिकॉर्डर कैमेरे के साथ ही लगा हुआ था मतलब रिकॉर्डर अलग से पकड़ने की जरूरत नही थी और ऑपरेटिंग सिस्टम भी आसान था। लेकिन इससे टीम में से एक आदमी की नौकरी पर बन आयी क्योंकि अब अलग से साउंड रिकॉर्डर की जरूरत नही थी। तकनीक के इस युग मे समय के साथ तेजी से परिवर्तन हो रहा था । जल्द ही डिजिटल कैमरा बाजार में आ गए। सोनी , पैनासोनिक और जे वी सी कंपनियों में आगे बढ़ने की होड में बहुत ही छोटे कैमेरे बनने लगे मिनी डीवी के रूप में । इन छोटे कैमरों ने बाजार में हलचल मचा दी थी। आकार में छोटे , लेकिन शूटिंग समय और पिक्चर क्वालिटी में कहीं बेहतर साथ मे रंगीन व्यू फाइंडर भी। 4 लोगों की टीम अब घटकर 2 की हो चुकी थी । लेकिन स्टोरी शूट कर टेप जल्द से जल्द अपने दफ़्तर या फिर दिल्ली भेजना पड़ता था ।इसके लिए राइडर रखे जाते थे वो मोटरसाइकिल पर शहर में घूम घूम कर रिपोर्टरों से टेप लेते और दफ्तर लाकर देते ताकि स्टोरी एडिट हो सके। अपलिंकिंग की व्यवस्था नही होने की वजह से विमान से टेप दिल्ली भेजने पड़ते थे। लेकिन साल 2000 तक इस समस्या का भी समाधान निकल गया। बडे बडे छातों वाली ओ बी यानी कि ब्रॉडकास्टिंग वैन आ चुकी थी। जिसके जरिये सिर्फ शूट किया हुआ ही दफतर में या दिल्ली भेजना आसान नही हुआ था लाइव टेलीकॉस्ट भी सम्भव हो गया था। अभी तक दिन में तय समय पर ही दिखने वाले टी वी न्यूज अब 24 घंटा चलने लगे थे। टी वी खबरों की दुनिया मे तहलका मच चुका था।दुनियां में कहीं भी कुछ हुआ तो उसकी तस्वीर तुरंत टी वी चैनलों पर देखने को मिल जाती थी। जापान में आयी सुनामी के बाद डिजिटल मीडिया में बड़ी क्रांति आई। मैग्नेटिक प्लास्टिक टेप की बजाय टेप लेस टेक्नोलॉजी यानी चिप का उदय हुआ।। कैमरा , एसेसरीज और टेप सबकुछ बदल गया। छोटे से मेमरी कार्ड में बड़ी दुनिया समाने लगी। वीडियो की क्वालिटी भी हाई डेफिनेशन में हो गई। कम आदमी और कम खर्चे में अच्छा परिणाम , टीवी न्यूज के लिए वरदान साबित होने लगा था। उसके बाद आई मोबाइल और इंटरनेट क्रांति ने तो दुनिया की तस्वीर ही बदलकर रख दी। जिस मोबाइल फोन का ईजाद दूर बैठे शख्स से संपर्क यानी बात करने के लिए हुआ था। वो ऑडियो वीडियो रिकॉर्डिंग की सुविधा से लैस हो गया। पहले तस्वीर खींचने की सुविधा थी , फिर ऑडियो और वीडियो रिकॉर्डिंग भी होने लगी। इंटरनेट से वीडियो भेजना भी आसान हो गया। अब तो आलम ये है कि सोशल मीडिया पर अनेको न्यूज वेबसाइट खुल गई हैं जिसपर मोबाइल से ही शूट किए वीडियो से खबरें बनकर अपलोड हो रही हैं। लेकिन न्यूज चैनलों में मोजो जर्नलिज्म का क्रेडिट एन डी टी वी को जाता है।अब इसे गला काट प्रतियोगिता में सीमित साधनों के साथ टिके रहने की चुनौती कहें या नई तकनीकी के प्रयोग का साहस जो भी हो एन डी टी वी ने मोबाइल जर्नलिज्म को स्थापित कर दिया है। हालांकि ये इतना आसान भी नही था । खबर सोचने से लेकर शूट करने और उसे अपलिंक करने तक सारी जिम्मेदारी एक अकेले रिपोर्टर पर आ गई यानी खबरनवीस कम टेक्निकल ज्यादा । कैमरामैन की नौकरी पर बन आयी लिहाजा नाराजगी स्वाभाविक थी । फील्ड में दूसरे चैनलों के कैमरामैनो की नजर में अभी अचानक से हम दुश्मन बन गए। लेकिन एन डी टी वी अपने प्रयोग पर टिका रहा। शूट में गुणवत्ता के लिए सभी रिपोर्टरों को सैमसंग 8 प्लस के नए मोबाइल दिए गये। जो एच डी से भी सुपर क्वालिटी 4k से लैस है। शुरू में चैनल ने एक मोजो बुलेटिन शुरू किया फिर धीरे - धीरे स्टुडिओ एंकरिंग से लेकर कई बुलेटिन मोजो से ही शूट होने लगे। अब तो मोबाइल से सीधा प्रसारण भी होना शुरू हो गया है। संवाददाता फील्ड से ही न सिर्फ तस्वीरें बल्कि अपनी स्टोरी एडिट कर न्यूजरूम भेज सकता है। न्यूजरूम भी अब बदल रहे हैं और अब पारंपरिक न्यूजरूम की जगह मल्टीमीडिया न्यूजरूम आ गए हैं। जापान के एक न्यूज चैनल ने तो बाकायदा इस पर एक टीवी रिपोर्ट भी बनाया है जो वायरल हुआ और लोगों ने पसंद भी किया। आज आलम ये है कि दूसरे चैनल भी अब मोजो जर्नलिज्म की तरफ बढ़ रहे हैं। बड़ी बात ये है कि शुरू में कुछ बड़े नेता ,अभिनेता,अफसर और वकील मोबाइल पर शूट करते देख विदक जाते थे लेकिन अब ऐसा नही है। अब तो कई नेता और अफसर अपनी बाइट यानी कि इंटरव्यू क्लिप खुद ही बनाकर टी वी पत्रकारों को भेजने लगे हैं। जिससे उनका समय और ऊर्जा दोनों की बचत हो रही है। इंटरनेट और मोबाइल ने तो दुनिया को इस कदर नजदीक ला दिया है कि दुनिया के किसी भी कोने में बैठकर हम कहीं की भी स्टोरी कर सकते हैं अन्याय और समस्याओं को उजागर कर न्याय भी दिला सकते हैं। भारत के 77 भारतीय मजदूर श्रीलंका में भुवलका स्टील में काम कर रहे थे। लेकिन प्रोडक्शन में कमी की वजह से उनका वेतन रुक गया था । हालत ये हो गई थी कि वो खाने के लिए मोहताज हो गए और भारत वापस आने के लिए टिकट के पैसे भी नही थे। सोशल मीडिया के जरिये उनकी लाचारी की जानकारी मिलते ही मैंने उनसे मोबाइल से संपर्क किया और उन्हें अपना दर्द शूट कर व्हाट्सअप करने को कहा। उन्होंने वीडियो ओर बाइट बनाकर भेजा। सबकुछ जांच पड़ताल कर और कंपनी के मालिक की प्रतिक्रिया के साथ खबर बनाई । चैनल पर खबर चली और विदेश मंत्रालय ने तुरतं उसमें दखल दिया । नतीजा सभी 77 भारतीय अपने वतन वापस आने में कामयाब रहे। लेकिन इसके फायदे हैं तो नुकसान भी । आज सभी के हाथ मे मोबाइल है और उसमे इंटरनेट। जिसे जो मन मे आता है उसे शूट कर या कुछ भी लिखकर पोस्ट कर देता है। जनता भी खुद को पत्रकार से कम नही समझती। जगहं - जगहं सिटीजन जर्नलिस्ट पैदा हो गए हैं। लेकिन चूंकि इन्हें पत्रकारिता की नियमावली पता नहीं होती इसलिए वो बिना सोचे समझे पोस्ट कर कभी कभी मुसीबत भी खड़ी कर देते हैं। फिर मोबाइल जर्नलिज्म की अपनी कुछ सीमाएं भी हैं। जिन इलाकों में इंटरनेट स्पीड धीमी है वहां से खबरें भेजने में परेशानी आ सकती है। इसके अपने नैतिक तथा कानूनी पक्ष भी हैं। खबरें करते वक्त दूसरों की निजता का सम्मान करना बेहद जरूरी है। बिना किसी को जानकारी दिए बातचीत रिकॉर्ड करना नैतिकता के दायरे में नहीं आता। इसी तरह जहां टीवी कैमरों को जाने की इजाजत नहीं है, वहां स्मार्ट फोन से शूट करना पत्रकारिता की मर्यादा से बाहर है। फिर जगह-जगह सोशल मीडिया से आए वीडियो क्लिप की पुष्टि करना भी आसान नहीं ...
सी. जी. मूलर ने बिल्कुल सही कहा है कि-
सामायिक ज्ञान का व्यवसाय ही पत्रकारिता है। इसमें तथ्यों की प्राप्ति उनका मूल्यांकन एवं ठीक-ठाक प्रस्तुतीकरण होता है।
(Journilism is business of timely knowledge the business of obtaining the necessary facts, of evaluating them carefully and of presenting them fully and of acting on them wisely.)
डॉ॰ अर्जुन तिवारी के कथानानुसार-
ज्ञान और विचारों को समीक्षात्मक टिप्पणियों के साथ शब्द, ध्वनि तथा चित्रों के माध्यम से जन-जन तक पहुँचाना ही पत्रकारिता है। यह वह विद्या है जिसमें सभी प्रकार के पत्रकारों के कार्यो, कर्तव्यों और लक्ष्यों का विवेचन होता है। पत्रकारिता समय के साथ समाज की दिग्दर्शिका और नियामिका है।
डॉ बद्रीनाथ कपूर के अनुसार - पत्रकारिता पत्र पत्रिकाओं के लिए समाचार लेख एकत्रित तथा संपादित करने, प्रकाशन आदेश देने का कार्य है |
हिंदी शब्द सागर के अनुसार- पत्रकार का काम या व्यवसाय पत्रकारिता है|
श्री प्रेमनाथ चतुर्वेदी के अनुसार- पत्रकारिता विशिष्ट देश, काल और परिस्थिति के आधार पर तथ्यों का, परोक्ष मूल्य का संदर्भ प्रस्तुत करती है |
टाइम्स पत्रिका के अनुसार- पत्रकारिता इधर-उधर उधर से एकत्रित, सूचनाओं का केंद्र, जो सही दृष्टि से संदेश भेजने का काम करता है, जिससे घटनाओं का सहीपन को देखा जाता है|
डॉ कृष्ण बिहारी मिश्र के अनुसार- पत्रकारिता वह विद्या है जिसमें पत्रकारों के कार्यों, कर्तव्यों, और उद्देश्यों का विवेचन किया जाता है| जो अपने युग और अपने संबंध में लिखा जाए वह पत्रकारिता है|
डॉ भुवन सुराणा के अनुसार- पत्रकारिता वह धर्म है जिसका संबंध पत्रकार के उस धर्म से है जिसमें वह तत्कालिक घटनाओं और समस्याओं का अधिक सही और निष्पक्ष विवरण पाठक के समक्ष प्रस्तुत करता है|
उपरोक्त परिभाषाएं के आधार पर हम कह सकते हैं कि पत्रकारिता जनता को समसामयिक घटनाएं वस्तुनिष्ठ तथा निष्पक्ष रुप से उपलब्ध कराने का महत्वपूर्ण कार्य है |सत्य की आधार शीला पर पत्रकारिता का कार्य आधारित होता है तथा जनकल्याण की भावना से जुड़कर पत्रकारितासामाजिक परिवर्तन का साधन बन जाता है|



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