अमित श्रीवास्तव
 संपादक
हिन्द न्यूज़ टाइम्स

     *"मकर संक्रान्ति"*

(A) आज "मकर संक्रान्ति" है। आज के दिन सूर्य उत्तरायण होते है। आज के दिन लोग प्रात:काल नहाकर सूर्य को जल देते है, अपनी क्षमतानुसार... ज़रूरतमंद लोगों को दान देते है।

(B) आज लाखों - लाख लोग देश की विभिन्न नदियों में, इलाहाबाद संगम तट पर और कोलकाता के गंगासागर में.... डुबकी लगाकर अपने "पापकर्मो" को धोने और अपने अंदर "अच्छे विचारों" की गंगा बहाने का पुनीत कार्य कर रहे है।

(C) अब प्रश्न यह उठता है कि "पापकार्य" क्या है ? और "अच्छे कार्य" क्या है ? इसका clarification बहुत ही सुन्दर तरीक़े से "योगीराज कृष्ण" ने "दैवीय और असुरी सम्पदा" के रूप में निम्न प्रकार किया है:-

(C- 1) गीता में भगवान कृष्ण कहते है कि सम्पदायें दो प्रकार की होती है:- "दैवीय सम्पदा" और "आसुरी सम्पदा" ।

भगवान कृष्ण अर्जुन से कहते है कि 'दैवीय सम्पदायें' 26 प्रकार की होती है:-

"अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थिति: ।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्।।

अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्याग: शान्तिरपैशुनम्।
दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्लीरचापलम् ।

तेज: क्षमा धृति: शौचमद्रोहो नातिमामिता।
भवन्ति संपदं दैवीमभिजातस्य भारत ।।"

(श्लोक 1-3; अध्याय 16; गीता)

अर्थ:-भगवान कृष्ण बोले:-

1. भय का अभाव,

2. अन्त:करण की निर्मलता,

3. ध्यानयोग में निरन्तरता,

4. सात्विक दान,

5. इन्द्रिय-निग्रह,

6. ईश्वर/देवता/गुरू की पूजा,

7. उत्तम-कर्म,

7. अच्छे शास्त्रो का अध्ययन,

9. भजन-कीर्तन,

10. अपने कर्तव्य का पालन,

11. सरलता,

12. मन / वाणी / शरीर से किसी को दुख न देना,

13. सत्य एवं प्रिय वाणी,

14. क्रोध का अभाव,

15. अभिमान का त्याग,

16. चंचलता का अभाव,

17. परनिन्दा का त्याग,

18. प्राणियों पर दया,

19. इन्द्रिय-भोग के समय अासक्ति का अभाव,

20. कोमल हृदय,

21. गलत आचरण में शर्म,

22. व्यर्थ कार्यों का अभाव,

23. तेज, क्षमा, धैर्य,

24. वाह्य-शुद्धि,

25. शत्रुता का अभाव और

26. महिमा-मंडन का अभाव

उपरोक्त 26 दैवीय सम्पदायें कहलाती है।
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निष्कर्ष:-  प्राय: हम सम्पदा का मतलब धन-दौलत समझते है। लेकिन यह गलत है। सच्ची सम्पदायें दो प्रकार की होती है:- "दैवीय सम्पदा" और "आसुरी सम्पदा" ।

हमको अपने अंदर से 'आसुरी सम्पदाओं' को समाप्त करके 'दैवीय सम्पदाओं' का विकास करना चाहिए ।
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